Tuesday, 30 June 2020

त्राल के बिलालाबाद इलाके में सुरक्षाबलों का आतंकियों से सामना, बीती रात से फायरिंग जारी https://ift.tt/2BXho5m

पुलवामा जिले के त्राल कस्बे के बिलालाबाद इलाके में सुरक्षाबलों का आतंकियों एनकाउंटर चल रहा है। आतंकियों के छिपे होने के इनपुट पर पुलिस और आर्मी ने बीती रात सर्च ऑपरेशन शुरू किया था।

इससे पहले मंगलवार को अनंतनाग जिले के वाघमा इलाके में सुरक्षाबलों ने 2 आतंकी मार गिराए थे। सोमवार को अनंतनाग के ही खुलचोहर इलाके में 3 आतंकी ढेर कर दिए थे। जून में 18 एनकाउंटर में कुल 51 आतंकी मारे गए। पुलिस ने पिछले दिनों जम्मू के डोडा जिले को आतंकवाद मुक्त घोषित कर दिया था।

तारीख जगह आतंकी मारे गए
1 जून नौशेरा 3
2 जून त्राल (पुलवामा) 2
3 जून कंगन (पुलवामा) 3
5 जून कालाकोट (राजौरी) 1
7 जून रेबन (शोपियां) 5
8 जून पिंजोरा(शोपियां) 4
10 जून सुगू(शोपियां) 5
13 जून निपोरा(कुलगाम) 2
16 जून तुर्कवंगम(शोपियां) 3
18-19 जून अवंतीपोरा और शोपियां 8
21 जून शोपियां 3
23 जून बंदजू (पुलवामा) 2
25 जून सोपोर (बारामूला) 2
25-26 जून त्राल (पुलवामा) 3
29 जून खुलचोहर (अनंतनाग) 3
30 जून वाघमा (अनंतनाग) 2
कुल 51

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एनकाउंटर वाली लोकेशन पर सुरक्षा बल मोर्चा संभाले हुए।


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अमेरिकी हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. फौसी ने कहा- देश में जल्द ही हर दिन 1 लाख तक मरीज मिल सकते हैं; दुनिया में अब तक 5.13 लाख लोगों की मौत https://ift.tt/2NWkzNr

दुनियाभर में कोरोनावायरस से अब तक 1 करोड़ 5 लाख 84 हजार 16 लोग संक्रमित हो चुके हैं। इनमें अब तक 57 लाख 94 हजार 597 लोग ठीक हो चुके हैं। वहीं, 5 लाख 13 हजार 861 लोगों की जान जा चुकी है। उधर, अमेरिका के कुछ राज्यों में फिर से संक्रमण के मामले बढ़ने लगे हैं। हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. एंथनी फौसी ने मंगलवार को कहा कि लोग अगर लापरवाही करते रहे तो जल्द ही यहां हर दिन 1 लाख तक मामले सामने आएंगे।

डॉ. फौसी ने कहा- फिलहाल हर दिन 40 हजार से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। महामारी अभी तक हमारे बीच से खत्म नहीं हुई है। संक्रमण के मामले बढ़ते देख अमेरिका के कैलिफोर्निया, टेक्सास जैसे 16 राज्यों को दोबारा खोले जाने की योजना को कैंसिल कर दिया गया है।

10 देश जहां कोरोना का असर सबसे ज्यादा

देश

कितने संक्रमित कितनी मौतें कितने ठीक हुए
अमेरिका 27,27,853 1,30,122 11,43,334
ब्राजील 14,08,485 59,656 7,90,040
रूस 6,47,849 9,320 4,12,650
भारत

5,85,210

17,410

3,47,836

ब्रिटेन 3,12,654 43,730 उपलब्ध नहीं
स्पेन 2,96,351 28,355 उपलब्ध नहीं
पेरू 2,85,213 9,677 1,74,535
चिली 2,79,393 5,688 2,41,229
इटली 2,40,578 34,767 1,90,248
ईरान 2,27,662 10,817 1,88,758

*ये आंकड़ेhttps://ift.tt/37Fny4Lसे लिए गए हैं।

बिडेन अब चुनावी रैली नहीं करेंगे
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन ने कहा है कि महामारी के चलते वे अब कोई रैली नहीं करेंगे। उन्होंने मंगलवार को डेलावेयर प्रांत में एक कार्यक्रम के दौरान यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि कोरोना को लेकर मैं डॉक्टर्स के आदेशों का पालन करने जा रहा हूं। यह केवल मेरे लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी बेहतर होगा। इसका मतलब मैं अब चुनाव प्रचार के लिए कोई रैली नहीं करूंगा।

सोशल मीडिया पर गलत जानकारी न फैलाएं: यूएन
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के प्रवक्ता स्टीफन डुजारिक ने बुधवार को कहा कि हमने बुधवार को ‘पॉज’ नाम के अभियान की शुरुआत की है, जिसमें लोगों से सोशल मीडिया पर कोरोना को लेकर भ्रामक और गलत जानकारी नहीं फैलाने का आग्रह किया गया है। सोशल मीडिया दिवस के दिन इस अभियान की शुरुआत की गई है।

मॉस्को: अब तक 3831 मौतें
मॉस्को में 24 घंटे में कोरोना से 35 लोगों की मौत हुई है। यहां अब तक 3831 मौतें हो चुकी हैं। मॉस्को के कोरोनावायरस रिस्पॉन्स सेंटर ने मंगलवार को बयान जारी कर कहा कि मॉस्को में 745 नए मामले दर्ज किए गए। एक सप्ताह के दौरान नए मामलों में 31% की कमी आई है। एक दिन पहले भी मॉस्को में 35 लोगों की मौत हुई थी। यहां अब तक 2.21 लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी है।

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अमेरिकी हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. एंथनी फौसी ने देश में संक्रमण का लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि लोगों को लापरवाही से बचना चाहिए, नहीं तो महामारी और बढ़ सकती है।


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कमेंटेटर भी खिलाड़ी के साथ रंग के आधार पर भेदभाव करते हैं, श्वेत खिलाड़ी की स्किल और अश्वेत की ताकत पर अधिक बात होती है https://ift.tt/3eOH1nm

जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद अश्वेत के साथ भेदभाव का मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार फुटबॉल मैच के दौरान कमेंटेटर भी खिलाड़ी के साथ रंग के आधार पर भेदभाव करते हैं। प्रोफेशनल फुटबॉलर्स एसोसिएशन (पीएफए) ने डैनिश फर्म रन रिपीट के साथ मिलकर रिसर्च कराया है।

इसमें स्पेनिश लीग ला लिगा, इंग्लिश लीग प्रीमियर लीग, इटैलियन लीग सीरी ए और फ्रेंच लीग लीग-1 के 2019-20 सीजन के 80 मैचों का एनालिसिस किया गया है। इसमें पाया गया है कि कमेंटेटर लाइटर स्किन वाले खिलाड़ी के इंटेलिजेंस, वर्क एथिक्स के बारे में ज्यादा बात करते हैं। वहीं डार्क स्किन वाले खिलाड़ियों की क्षमता, ताकत और पावर के बारे में बात की जाती है। लाइटर स्किन वाले खिलाड़ियों की स्किल, लीडरशिप और नॉलेज के लिए लगातार तारीफ जबकि डार्क स्किन वाले खिलाड़ियों की आलोचना से फुटबॉल देख रहे दर्शकों की सोच पर असर पड़ता है।

2074 बयान की समीक्षा की गई
रिसर्च 634 खिलाड़ियों पर हुआ। इसमें कमेंटेटर के 2,074 बयान की समीक्षा की गई। खिलाड़ियों को स्किन के आधार 1 से 20 तक का स्कोर दिया गया और फिर लाइटर स्किन वाले खिलाड़ी या डार्क स्किन वाले खिलाड़ी के रूप में नामित किया गया। खिलाड़ियों को फुटबॉल मैनेजर 2020 वीडियो गेम के डेटाबेस का उपयोग करके स्किन टोन के अनुसार कोड किया गया। रिसर्च में पाया गया है कि डार्क स्किन वाले खिलाड़ियों की ताकत पर कमेंट की संभावना 6.59 गुना ज्यादा रहती है। उनकी स्पीड पर 3.38 गुना ज्यादा बार कमेंट किया जाता है। इंटेलिजेंस और वर्क एथिक्स पर 60% से अधिक तारीफ लाइटर स्किन टोन वाले खिलाड़ियों की होती है।

इंग्लिश फुटबॉल में मैनेजर की संख्या बढ़ाई जाएगी
प्रीमियर लीग, ईएफएल और पीएफए इंग्लैंड में ब्लैक, एशियन और माइनॉरिटी लोगों के मैनेजर की संख्या बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। अभी 91 क्लब में सिर्फ 6 ऐसे मैनेजर हैं। अगले सीजन में 6 कोच को ईएफएल क्लब के साथ 23 महीने के लिए रखा जाएगा।



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आर्सनल क्लब ने ब्लैक लाइव्स मैटर का समर्थन किया।


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किसी की दो साल में कमाई पहुंच गई 5 लाख रुपए महीना तक, तो किसी को मुंबई से शो के लिए कॉल आया https://ift.tt/3gfhggd

सरकार ने टिक टॉक को बैन कर दिया है। इस ऐप के जरिए दो साल में ही किसी की कमाई 5 लाख रुपए महीना तक पहुंच गई तो किसी के टैलेंट को मुंबई में प्लेटफॉर्म मिल गया। ये लोग सरकार के डिसीजन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन टिक टॉक की तरह ही ऐसा कोई प्लेटफॉर्म चाहते हैं जहां इनके टैलेंट को मौका भी मिलते रहे और चीन की दखलअंदाजी भी न हो।

दो साल में 12 मिलियन फॉलोअर्स, कमाई 5 लाख रुपए महीना तक

टिक टॉक पर 12 मिलियन फॉलोअर्स वाले सन्नी कालरा कहते हैं कि, हम सरकार के डिसीजन के साथ हैं। सन्नी टिक टॉक से हर महीने 3 से 5 लाख रुपए तक कमाते हैं। वे कहते हैं कि, मैं पिछले दो साल से इस ऐप पर एक्टिव हूं। हर रोज एक वीडियो पोस्ट करता हूं। लेकिन हमें ज्यादा दिक्कत इसलिए नहीं होगी कि क्योंकि हम लोग कंटेंट क्रिएटर हैं। टिक टॉक बैन हो गया है तो अब हम यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर ज्यादा मेहनत करेंगे। लिपसिंग करने वाले जरूर परेशान हो जाएंगे। यूट्यूब पर एक अच्छा वीडियो बनाने में पांच से छ दिन का वक्त लगता है। टिक टॉक पर एक दिन में एक वीडियो हो जाता है।

सन्नी के टिक टॉक पर 12 मिलियन से भी ज्यादा फॉलोअर्स हैं। वे यूजर्स के बीच काफी पॉपुलर हैं।

महज दो साल में 12 मिलियन लोगों को अपने साथ जोड़ने वाले सन्नी बताते हैं कि, मैं तो अपने कैफेटेरिया में लोगों को वीडियो बनाते देखता था। वहीं से खुद का वीडियो बनाने का आइडिया आया। एक फ्रेंड ने वीडियो बनाने को कहा। शुरू में कुछ वीडियो बनाए। अच्छे लगे तो और बनाते गया। फिर टिक टॉक ने इतनी ज्यादा पॉपुलेरिटी दी, जिसके बारे में सोचा भी नहीं था। अब सरकार हमें अकाउंट डिलीट करने का बोलेगी तो हम वो भी कर देंगे और यूट्यूब-इंस्टाग्राम वाले अकाउंट पर मेहनत करेंगे।

इतने दोस्त बन गए कि मिलने में तीन-चार दिन लग जाते हैं

छतरपुर के जितेंदर पाल सिंह कहते हैं कि, छोटी सी जगह में रहने के बावजूद मुझे और मेरी पत्नी को देशभर में पहचान सिर्फ टिक टॉक पर वीडियो पोस्ट करनेके चलते मिली। मुंबई, दिल्ली, यूपी, पंजाब में हमारे इतने दोस्त बन गए कि यहां जाओ तो सिर्फ लोगों से मिलने में ही तीन से चार दिन लग जाते हैं। तीन साल में 36 लाख फॉलोअर्स बन गए। हर महीने 40 से 50 हजार रुपए की कमाई हो रही है, लेकिन फिर भी हम सरकार के डिसीजन के साथ हैं, क्योंकि सबसे पहले तो देश ही है। जितेंदर के मुताबिक, दिक्कत उन लोगों को होगी जो टिक टॉक के सहारे ही चल रहे हैं।

जितेंदर सिंह छतरपुर जैसी छोटी जगह रहते हैं, लेकिन अपने टैलेंट की दम पर देशभर में फेमस हो गए।

ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो महीने के 10-15 हजार रुपए टिक टॉक से कमा लेते हैं। टिक टॉक ने लोगों की जिंदगिंया बदली हैं। टिक टॉक पर टैलेंट दिखाने के बाद ही मेरी पत्नी को मनीष पॉल के शो'मूवी मस्ती विद मनीष पॅाल' में बुलाया गया। जहां वो विनर साबित हुईं। वरना हम जितनी छोटी जगह रहते हैं, वहां के लोगों को कहां इतना बड़ा प्लेटफॉर्म मिल पाता।

बिहार में झोपड़ी में रहने वाले बच्चों का डांस इतना पसंद किया गया कि उन्हें टिकट भेजकर मुंबई बुलाया गया और देशभर ने उनका टैलेंट देखा। हमारे देश में टैलेंट भरा पड़ा है लेकिन कोई ने कोई प्लेटफॉर्म तो जरूरी है। मैं एक दिन में दो से तीन वीडियो पोस्ट करता हूं। चिंता सिर्फ उन लोगों की है, जिनकी रोजी-रोटी टिक टॉक बन गया था।

हताश और निराश लोगों को मोटिवेट करने का बना जरिया

एसिड अटैक सर्वाइवरऔर टिक टॉक पर काफी वीडियो पोस्ट करने वालीं लक्ष्मी अग्रवाल कहती हैं, टिक टॉक पर मुझे ऐसे लोग मिले थे, जो जिंदगी से हताश और निराश हो चुके हैं। जो पूरी तरह से डिमोटिवेट हो चुके थे और टिक टॉक के वीडियोदेखकर दोबारा मोटिवेट हुए हैं। मैं पिछले करीब 7 महीनों से टिक टॉक पर काफी ज्यादा एक्टिव हुई हूं। पहले मुझे ये फालतू लगता था लेकिन जब मैंने कुछ वीडियो देखे और पोस्ट करना शुरू किए तो पता चला कि यह तो लोगों की जिंदगी बदलने का जरिया है। मेरे टिक टॉक में ढाई मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स हैं, लेकिन मैं इससे कमाई नहीं करती।

लक्ष्मी अग्रवाल टिक टॉक पर अधिकतर मोटिवेशनल वीडियो शेयर करती हैं।

मैं सिर्फ इसके लिए लोगों को मोटिवेट करने का काम कर रही हूं। सरकार टिक टॉक बैन कर रही है, इससे इश्यू नहीं है लेकिन सरकार को पहले ऐसा कोई प्लेटफॉर्म लाना चाहिए जहां लोगों को अपना टैलेंट दिखाने का मौका मिले। टिक टॉक के जरिए मैं अपने डांस, गाने, एक्टिंग के हुनर को लोगों के सामने ला पाई।मेरे मोटिवेशनल वीडियोज से लोगों की जिंदगी बदलती है, यह देखकर बहुत सुकून मिलता है।

सालभर में 6 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स बने, एक करोड़ रुपए ईनाम मिला

टिक टॉक पर बने डांस वीडियो के जरिए रातों-रात फेमस हुए जोधपुर के स्ट्रीट डांसर युवराज सिंह परिहार कहते हैं- मैं पिछले साल ही टिक टॉक पर आया था। मैंने डांस करना शुरू किया और टिक टॉक पर वीडियो पोस्ट करने लगा। एक साल में ही 6 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स बने लेकिन मैंने अभी तक इसके जरिए कमाई नहीं की क्योंकि मुझे पता ही नहीं है कि इससे कमाई कैसे की जाती है। हां, एक वीडियो अमिताभ बच्चन के रिट्वीट करने के बाद सुर्खियों में आया था। वे कहते हैं कि, टिक टॉक को बैन करना सही है या नहीं, ये मुझे नहीं पता। इस बारे में मेरी कोई सोच नहीं है लेकिन बस इतना है कि मैं हर कंडीशन में सरकार के साथ हूं। चाहे कोई भी डिसीजन हो।

युवराज के महज एक साल में टिक टॉक पर 6 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स बन गए।

युवराज के पिता टाइल्स लगाने का काम करते हैं। परिवार में दो बहनें और मां-पापा हैं, कुछ समय पहले तक हालत इतनी खराब थी कि गुजारा भी मुश्किल से होता था। इसी बीच युवराज ने डांसिंग सीखना शुरू किया। उन्हें अपने टैलेंट को लोगों के सामने लाने के लिए टिक टॉक मिल गया। जिससे वे फेमस होते चले गए। युवराज रिएलिटी शो एंटरटेनमेंट नंबर वन के विजेता रहे हैं। उन्हें एक करोड़ रुपए की इनामी राशि मिली। वे कहते हैं कि, यदि टैलेंट है तो उसे कोई दबा नहीं सकता। टिक टॉक नहीं होगा तो हम दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर अपनाटैलेंट दिखाएंगे। बस एक ही सपना है कि डांसिंग में एक बार इंडिया को रिप्रेजेंट करूं।



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TikTok App Ban in India; Content Creators From Madhya Pradesh Indore Jodhpur Speaks To Dainik Bhaskar


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कोरोना से 50 गुना अधिक मारक महामारी फैली तो क्या होगा; संक्रमण कहीं कम तो कहीं ज्यादा क्यों, ऐसे कई सवालों के जवाब जरूरी: रेटक्लिफ https://ift.tt/38h5krJ

2019 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार पाने वाले डॉक्टर पीटर रैटक्लिफ नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी विशेषज्ञ) हैं। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर व फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के क्लीनिकल रिसर्च डायरेक्टर हैं। आज नेशनल डॉक्टर्स डे पर भास्कर के रितेश शुक्ल ने उनसे विशेष बातचीत की। उन्होंने कोरोना महामारी और भविष्य से जुड़े गंभीर सवालों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ को खत्म नहीं किया जा सकता, उसे अपना तरीका बदलना होगा। इसके लिए राजनीति और नेताओं में सहमति जरूरी है। पढ़िए उनसे बातचीत के संपादित अंश...

जब मुझे नोबेल पुरस्कार मिला तो इतने कॉल आने लगे कि अचानक लगा कि मैं कोई महान आत्मा हूं। यहां तक कि मेरे बच्चों ने भी मुझे आदर भाव से देखा। हमारे इस पेशे की खास बात ये है कि मरीजों को देखने और रिसर्च में समय निकल जाता है। शरीर के कलपुर्जे क्यों अपना काम करने में सुस्त पड़ जाते हैं और कैसे इन्हें दोबारा चुस्त बना दिया जाए, यह यात्रा अपने आप में आनंददायक है। यही भावना एक डॉक्टर को डॉक्टर बनाती है। मौजूदा कोरोना का दौर यह बताता है कि हमें भविष्य में क्या होगा, इसकी तैयारी पहले से करनी होगी। इसमें सबसे बड़ी बाधा यह है कि इस दुनिया में उद्दंडता की हद तक प्रश्न पूछना फैशन के खिलाफ माना जाता है।

समाज में हर बात को मानना, कोई प्रश्न न उठाना फैशन है और इसीलिए अधिकतर लोग कोई खोज नहीं करते और योजनाएं पूरी न होने पर परेशान हो जाते हैं। समाज में हमें एक संतुलन चाहिए, दो किस्म के लोगों में। एक वो हैं जो मान्यताओं को तोड़ते हैं और असहनीय लेकिन उपयोगी प्रश्न उठाते हैं। दूसरे वो, जो फैशन से जुड़कर अपना जीवन बिताते हैं। दूसरा यह कि निर्णय लेने पर हम जरूरत से ज्यादा जोर देते हैं, पर निर्णय लेने के बाद क्या करना है, उस पर ध्यान नहीं देते। ये बात मैं इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि हम जो निर्णय लेते हैं, जो योजनाएं बनाते हैं, जरूरी नहीं कि वो पूरी हों।

मसलन, पुरस्कार की घोषणा के बाद मेरे 300 कार्यक्रम तय हो गए। लेकिन अचानक कोरोना के चलते ये सभी टल गए। अब कोरोना काल में प्रश्न ये है कि भविष्य में अगर इससे बड़ी महामारी आई, जिसमें मृत्युदर कोरोना से 50 गुना ज्यादा हो, तो क्या किया जाएगा? क्यों भारत में कोरोना संक्रमण से होने वाली मृत्युदर कम है, लेकिन इटली या स्पेन में अधिक है।

वैक्सीन कब बनेगी?

इन प्रश्नों के उत्तर इस पर निर्भर करते हैं कि मानव शरीर पर कितने परीक्षण हो रहे हैं। हमें ये नहीं पता है कि ये बीमारी सीधे खून पर असर करती है या किसी रिएक्टिव माध्यम से खून में पहुंचती है। जब तक इस बात का पता नहीं चलेगा तब तक विश्वसनीय वैक्सीन या दवा बनाने में दिक्कतें आएंगी। कोरोना के केस में मेरा मानना है कि हाइपोक्सिया पर स्टडी तेज करने की जरूरत है। हाइपोक्सिया वह परिस्थिति होती है, जब जरूरत जितना ऑक्सीजन शरीर के टिश्यूज तक नहीं पहुंच पाता। इससे वेंटिलेटर की जरूरत कम की जा सकती है।

मेरे हिसाब से एल्मिट्रीन दवा, जिसे एक फ्रेंच कंपनी बनाती है, उसका ट्रायल शुरू करना चाहिए। यह फेफड़ों की बीमारी की दवा है लेकिन इसका इस्तेमाल रोक दिया गया। ट्रायल से कोविड मामलों में इसकी उपयोगिता का पता लगाया जा सकता है। अंतत: परीक्षण के बिना ऐसे सवालों का उत्तर नहीं मिल सकता। चिकित्सा समुदाय, मेडिकल टेक्नोलॉजी को सारा ध्यान इनका उत्तर ढूंढने में लगा देना चाहिए।

ऑफिसों में कार्यप्रणाली क्या होगी?

अगर महामारी का खतरा बना हुआ है तो फिर ऑफिसों में कार्यप्रणाली क्या होगी? ऐसे ही बिल्डिंग डिजाइन, फायर रेगुलेशन इत्यादि जैसे विषयों पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में महामारी के दौरान जान-माल को बचाया जा सके। आज वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन जैसे वैश्विक संस्थानों पर भी कोरोना काल में आरोप लगने लगे हैं।

मैं ये नहीं कहूंगा कि अब डब्ल्यूएचओ की जरूरत नहीं है, लेकिन इनके काम करने के तरीके में बदलाव की आवश्यकता है। राजनीतिक निर्णयों में सामंजस्य नहीं है। राजनीति अपने हितों को ध्यान में रखकर निर्णय करती आई है, जबकि कोरोना महामारी ने साफ कर दिया है कि अब राजनीतिक निर्णय दुनियाभर के लोगों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

केमिस्ट्री पढ़ना था, शिक्षक बोले- मेडिसिन पढ़ो
जब मैं कॉलेज में दाखिला ले रहा था, तो केमेस्ट्री लेना चाहता था। लेकिन मेरे हेड मास्टर के कहने पर मेडिसिन ली। न उन्होंने कुछ समझाने की कोशिश की और न ही मैंने कोई सवाल किए। मैंने उनके कहने पर चुना और आज मुझे अपना काम बहुत पसंद है। मुझे लगता है कि ये निर्णय करना ज्यादा जरूरी है कि आप क्यों कुछ करना चाहते हैं, तब आप यह तय कर पाएंगे कि आप क्या करना चाहते हैं।



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पीटर रैटक्लिफ ने कहा कि डब्ल्यूएचओ को खत्म नहीं किया जा सकता, उसे अपना तरीका बदलना होगा। इसके लिए राजनीति और नेताओं में सहमति जरूरी है। (फाइल)


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डोनाल्ड ट्रम्प ने मर्केल को बेवकूफ और थेरेसा मे को कमजोर बताया; पूर्व राष्ट्रपति बुश, ओबामा का अपमान किया: रिपोर्ट https://ift.tt/2ZvCoZ4

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प विदेश के राष्ट्राध्यक्षों से बातचीत के लिए तैयारी नहीं करते, इसके अलावा खुफिया एजेंसियों द्वारा तैयार ब्रीफिंग नहीं पढ़ते। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के ऐसे फोन भी सुन लेते हैं, जिनकी पहले से कोई सूचना नहीं होती। उन्होंने ऐसा करके कई बार सुरक्षा सलाहकारों को सकते में डाल दिया। यह दावा वाटरगेट कांड के पत्रकार कार्ल बर्नस्टीन ने किया है।

उन्होंने सूत्रों से बातचीत करके ट्रम्प के विदेशी नेताओं के साथ सैकड़ों निजी फोन कॉल की डिटेल्स पता करके सीएनएन के लिए रिपोर्ट तैयार की है। इसके मुताबिक ट्रम्प फोन पर अपनी उपलब्धियों और समृद्धि का बखान करते रहते हैं और भ्रमित रहते हैं इससे कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ चुकी है।

जर्मन चांसलर मर्केल को बेवकूफ कहा था: रिपोर्ट

महिला नेताओं का अपमान ट्रम्प करते ही रहते हैं, इसी कड़ी में उन्होंने जर्मन चांसलर मर्केल को बेवकूफ कहा, और उन्हें रूस का अनुयायी बता दिया। वहीं ब्रेग्जिट पर थेरेसा मे को कमजोर बताया। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों को ईरान और जलवायु मुद्दे पर मन न बदलने के लिए लताड़ लगाई।

पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन से बातचीत में उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और ओबामा को जमकर कोसा, अपमानजनक बातें कही। साथ ही कहा कि सभी मुद्दों पर सीधे मुझसे बात करें। एर्दोगन ने ट्रम्प की मध्य-पूर्व पर कम जानकारी का फायदा उठाया। सऊदी किंग सलमान, उत्तर कोरिया के किम जोंग उन की ट्रम्प से खूब जमी, क्योंकि वे उपलब्धियों पर ट्रम्प की तारीफ करते हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन से बातचीत में कभी नहीं जीत पाए ट्रम्प: सूत्र
सूत्रों का दावा है कि पुतिन से बातचीत के दौरान ट्रम्प का अंदाज अलग होता है। क्योंकि पुतिन पश्चिम को तवज्जो ही नहीं देते। ऐसे में ट्रम्प को लगता है कि वो पुतिन के सामने खुद को कारोबारी और सख्त व्यक्ति के तौर पर पेश करेंगे तो पुतिन सम्मान करेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, पुतिन ने बातचीत में हर बार उन्हें मात दी।



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सूत्रों का दावा है कि पुतिन से बातचीत के दौरान ट्रम्प का अंदाज अलग होता है, क्योंकि पुतिन पश्चिम को तवज्जो ही नहीं देते। (फाइल फोटो)


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डोनाल्ड ट्रम्प ने मर्केल को बेवकूफ और थेरेसा मे को कमजोर बताया; पूर्व राष्ट्रपति बुश, ओबामा का अपमान किया: रिपोर्ट https://ift.tt/2ZvCoZ4

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प विदेश के राष्ट्राध्यक्षों से बातचीत के लिए तैयारी नहीं करते, इसके अलावा खुफिया एजेंसियों द्वारा तैयार ब्रीफिंग नहीं पढ़ते। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के ऐसे फोन भी सुन लेते हैं, जिनकी पहले से कोई सूचना नहीं होती। उन्होंने ऐसा करके कई बार सुरक्षा सलाहकारों को सकते में डाल दिया। यह दावा वाटरगेट कांड के पत्रकार कार्ल बर्नस्टीन ने किया है।

उन्होंने सूत्रों से बातचीत करके ट्रम्प के विदेशी नेताओं के साथ सैकड़ों निजी फोन कॉल की डिटेल्स पता करके सीएनएन के लिए रिपोर्ट तैयार की है। इसके मुताबिक ट्रम्प फोन पर अपनी उपलब्धियों और समृद्धि का बखान करते रहते हैं और भ्रमित रहते हैं इससे कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ चुकी है।

जर्मन चांसलर मर्केल को बेवकूफ कहा था: रिपोर्ट

महिला नेताओं का अपमान ट्रम्प करते ही रहते हैं, इसी कड़ी में उन्होंने जर्मन चांसलर मर्केल को बेवकूफ कहा, और उन्हें रूस का अनुयायी बता दिया। वहीं ब्रेग्जिट पर थेरेसा मे को कमजोर बताया। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों को ईरान और जलवायु मुद्दे पर मन न बदलने के लिए लताड़ लगाई।

पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन से बातचीत में उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और ओबामा को जमकर कोसा, अपमानजनक बातें कही। साथ ही कहा कि सभी मुद्दों पर सीधे मुझसे बात करें। एर्दोगन ने ट्रम्प की मध्य-पूर्व पर कम जानकारी का फायदा उठाया। सऊदी किंग सलमान, उत्तर कोरिया के किम जोंग उन की ट्रम्प से खूब जमी, क्योंकि वे उपलब्धियों पर ट्रम्प की तारीफ करते हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन से बातचीत में कभी नहीं जीत पाए ट्रम्प: सूत्र
सूत्रों का दावा है कि पुतिन से बातचीत के दौरान ट्रम्प का अंदाज अलग होता है। क्योंकि पुतिन पश्चिम को तवज्जो ही नहीं देते। ऐसे में ट्रम्प को लगता है कि वो पुतिन के सामने खुद को कारोबारी और सख्त व्यक्ति के तौर पर पेश करेंगे तो पुतिन सम्मान करेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, पुतिन ने बातचीत में हर बार उन्हें मात दी।



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सूत्रों का दावा है कि पुतिन से बातचीत के दौरान ट्रम्प का अंदाज अलग होता है, क्योंकि पुतिन पश्चिम को तवज्जो ही नहीं देते। (फाइल फोटो)


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कोरोना से 50 गुना अधिक मारक महामारी फैली तो क्या होगा; संक्रमण कहीं कम तो कहीं ज्यादा क्यों, ऐसे कई सवालों के जवाब जरूरी: रेटक्लिफ https://ift.tt/38h5krJ

2019 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार पाने वाले डॉक्टर पीटर रैटक्लिफ नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी विशेषज्ञ) हैं। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर व फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के क्लीनिकल रिसर्च डायरेक्टर हैं। आज नेशनल डॉक्टर्स डे पर भास्कर के रितेश शुक्ल ने उनसे विशेष बातचीत की। उन्होंने कोरोना महामारी और भविष्य से जुड़े गंभीर सवालों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ को खत्म नहीं किया जा सकता, उसे अपना तरीका बदलना होगा। इसके लिए राजनीति और नेताओं में सहमति जरूरी है। पढ़िए उनसे बातचीत के संपादित अंश...

जब मुझे नोबेल पुरस्कार मिला तो इतने कॉल आने लगे कि अचानक लगा कि मैं कोई महान आत्मा हूं। यहां तक कि मेरे बच्चों ने भी मुझे आदर भाव से देखा। हमारे इस पेशे की खास बात ये है कि मरीजों को देखने और रिसर्च में समय निकल जाता है। शरीर के कलपुर्जे क्यों अपना काम करने में सुस्त पड़ जाते हैं और कैसे इन्हें दोबारा चुस्त बना दिया जाए, यह यात्रा अपने आप में आनंददायक है। यही भावना एक डॉक्टर को डॉक्टर बनाती है। मौजूदा कोरोना का दौर यह बताता है कि हमें भविष्य में क्या होगा, इसकी तैयारी पहले से करनी होगी। इसमें सबसे बड़ी बाधा यह है कि इस दुनिया में उद्दंडता की हद तक प्रश्न पूछना फैशन के खिलाफ माना जाता है।

समाज में हर बात को मानना, कोई प्रश्न न उठाना फैशन है और इसीलिए अधिकतर लोग कोई खोज नहीं करते और योजनाएं पूरी न होने पर परेशान हो जाते हैं। समाज में हमें एक संतुलन चाहिए, दो किस्म के लोगों में। एक वो हैं जो मान्यताओं को तोड़ते हैं और असहनीय लेकिन उपयोगी प्रश्न उठाते हैं। दूसरे वो, जो फैशन से जुड़कर अपना जीवन बिताते हैं। दूसरा यह कि निर्णय लेने पर हम जरूरत से ज्यादा जोर देते हैं, पर निर्णय लेने के बाद क्या करना है, उस पर ध्यान नहीं देते। ये बात मैं इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि हम जो निर्णय लेते हैं, जो योजनाएं बनाते हैं, जरूरी नहीं कि वो पूरी हों।

मसलन, पुरस्कार की घोषणा के बाद मेरे 300 कार्यक्रम तय हो गए। लेकिन अचानक कोरोना के चलते ये सभी टल गए। अब कोरोना काल में प्रश्न ये है कि भविष्य में अगर इससे बड़ी महामारी आई, जिसमें मृत्युदर कोरोना से 50 गुना ज्यादा हो, तो क्या किया जाएगा? क्यों भारत में कोरोना संक्रमण से होने वाली मृत्युदर कम है, लेकिन इटली या स्पेन में अधिक है।

वैक्सीन कब बनेगी?

इन प्रश्नों के उत्तर इस पर निर्भर करते हैं कि मानव शरीर पर कितने परीक्षण हो रहे हैं। हमें ये नहीं पता है कि ये बीमारी सीधे खून पर असर करती है या किसी रिएक्टिव माध्यम से खून में पहुंचती है। जब तक इस बात का पता नहीं चलेगा तब तक विश्वसनीय वैक्सीन या दवा बनाने में दिक्कतें आएंगी। कोरोना के केस में मेरा मानना है कि हाइपोक्सिया पर स्टडी तेज करने की जरूरत है। हाइपोक्सिया वह परिस्थिति होती है, जब जरूरत जितना ऑक्सीजन शरीर के टिश्यूज तक नहीं पहुंच पाता। इससे वेंटिलेटर की जरूरत कम की जा सकती है।

मेरे हिसाब से एल्मिट्रीन दवा, जिसे एक फ्रेंच कंपनी बनाती है, उसका ट्रायल शुरू करना चाहिए। यह फेफड़ों की बीमारी की दवा है लेकिन इसका इस्तेमाल रोक दिया गया। ट्रायल से कोविड मामलों में इसकी उपयोगिता का पता लगाया जा सकता है। अंतत: परीक्षण के बिना ऐसे सवालों का उत्तर नहीं मिल सकता। चिकित्सा समुदाय, मेडिकल टेक्नोलॉजी को सारा ध्यान इनका उत्तर ढूंढने में लगा देना चाहिए।

ऑफिसों में कार्यप्रणाली क्या होगी?

अगर महामारी का खतरा बना हुआ है तो फिर ऑफिसों में कार्यप्रणाली क्या होगी? ऐसे ही बिल्डिंग डिजाइन, फायर रेगुलेशन इत्यादि जैसे विषयों पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में महामारी के दौरान जान-माल को बचाया जा सके। आज वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन जैसे वैश्विक संस्थानों पर भी कोरोना काल में आरोप लगने लगे हैं।

मैं ये नहीं कहूंगा कि अब डब्ल्यूएचओ की जरूरत नहीं है, लेकिन इनके काम करने के तरीके में बदलाव की आवश्यकता है। राजनीतिक निर्णयों में सामंजस्य नहीं है। राजनीति अपने हितों को ध्यान में रखकर निर्णय करती आई है, जबकि कोरोना महामारी ने साफ कर दिया है कि अब राजनीतिक निर्णय दुनियाभर के लोगों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

केमिस्ट्री पढ़ना था, शिक्षक बोले- मेडिसिन पढ़ो
जब मैं कॉलेज में दाखिला ले रहा था, तो केमेस्ट्री लेना चाहता था। लेकिन मेरे हेड मास्टर के कहने पर मेडिसिन ली। न उन्होंने कुछ समझाने की कोशिश की और न ही मैंने कोई सवाल किए। मैंने उनके कहने पर चुना और आज मुझे अपना काम बहुत पसंद है। मुझे लगता है कि ये निर्णय करना ज्यादा जरूरी है कि आप क्यों कुछ करना चाहते हैं, तब आप यह तय कर पाएंगे कि आप क्या करना चाहते हैं।



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पीटर रैटक्लिफ ने कहा कि डब्ल्यूएचओ को खत्म नहीं किया जा सकता, उसे अपना तरीका बदलना होगा। इसके लिए राजनीति और नेताओं में सहमति जरूरी है। (फाइल)


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ये ऐप डाउनलोड करने वालों में हर तीन में से एक भारतीय; लॉकडाउन में आरोग्य सेतु से ज्यादा टिक टॉक डाउनलोड हुआ https://ift.tt/2Ahd1kT

लद्दाख सीमा पर भारत-चीन की सेनाओं के बीच जारी तनाव के बीच सोमवार को केंद्र सरकार ने चीन की 59 ऐप्स को भारत में बैन कर दिया है। केंद्र सरकार के इस कदम को सोशल मीडिया पर "डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक' करार दिया गया।

जिन 59 ऐप्स पर सरकार ने पाबंदी लगाई है, उसमें टिक टॉक भी शामिल है। टिक टॉक न सिर्फ देश बल्कि दुनिया की सबसे पॉपुलर ऐप्स है। दुनियाभर में टिक टॉक के डेढ़ अरब से ज्यादा डाउनलोड हैं। इसमें से एक तिहाई हिस्सा भारतीयों का है।

टिक टॉक डाउनलोड करने वालों में हर तीन में से एक भारतीय
मोबाइल ऐप इंटेलिजेंस पर काम करने वाली सेंसर टॉवर की रिपोर्ट के मुताबिक, टिक टॉक डाउनलोड करने वालों में सबसे ज्यादा भारतीय यूजर हैं। अब तक भारत में टिक टॉक को 61.1 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। यानी, जो लोग भी टिक टॉक डाउनलोड कर रहे हैं, उनमें से हर तीन यूजर में से एक भारतीय यूजर है।

हालांकि, भारत में टिक टॉक के मंथली एक्टिव यूजर्स की संख्या 20 करोड़ के आसपास है। इसका मतलब ये हुआ कि भले ही 61.1 करोड़ बार डाउनलोड हो चुका है, लेकिन इसमें से 20 करोड़ लोग ही ऐसे हैं, जो हर महीने कम से कम एक बार टिक टॉक पर आते हैं।

इतना ही नहीं, टिक टॉक को जितना भारतीयों ने डाउनलोड किया है, उतना तो इसे चीन में भी डाउनलोड नहीं किया गया। चीन में अब तक इस ऐप को करीब 20 करोड़ बार डाउनलोड किया गया है। जबकि, अमेरिका में इसे 16 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है।

दुनियाभर में टिक टॉक के जितने डाउनलोड्स हैं, उसमें से 30.3% डाउनलोड्स अकेले भारत में हैं। दूसरे नंबर पर चीन है, जहां कुल डाउनलोड्स में से 9.7% डाउनलोड्स हैं।

कोरोनावायरस का भी फायदा मिला टिक टॉक को
हाल ही में सेंसर टॉवर की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में 2020 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च तक के आंकड़े थे। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जनवरी से मार्च के बीच टिक टॉक को दुनियाभर में 31 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया गया।

सेंसर टॉवर की रिपोर्ट कहती है कि, 2016 से लेकर 2019 तक गूगल प्ले स्टोर पर सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाली ऐप्स में वॉट्सऐप का नाम पहले नंबर पर होता था। लेकिन, 2020 की पहली तिमाही में वॉट्सऐप को पीछे छोड़कर टिक टॉक पहले नंबर पर आ गई।

टिक टॉक को गूगल प्ले स्टोर से करीब 25 करोड़ बार डाउनलोड किया गया। जबकि, ऐपल के ऐप स्टोर से ये 6.7 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड हुई।

टिक टॉक के इतने डाउनलोड के पीछे कोरोनावायरस भी एक वजह है। सेंसर टॉवर के मुताबिक, कोरोना को फैलने से रोकने के लिए दुनियाभर की सरकारों ने लॉकडाउन लगा दिया था। जबकि, काफी पहले से ही इससे बचने के लिए लोग घरों पर रहने लगे थे।

इस रिपोर्ट में भी जनवरी से मार्च तक के ही आंकड़े हैं। जब दूसरी तिमाही के आंकड़े आएंगे, तो टिक टॉक के डाउनलोड्स और भी बढ़ने के पूरे-पूरे चांसेस हैं। क्योंकि, कोरोना मार्च में फैलना शुरू हुआ और उसके बाद ही कई देशों में लॉकडाउन लगा।

इस साल 5 महीने में 55 करोड़ से ज्यादा बार टिक टॉक डाउनलोड हुआ
इस साल जनवरी से लेकर मई तक 5 महीनों में टिक टॉक को 55 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया गया। इसमें से लगभग 16 करोड़ से ज्यादा यानी करीब 30% डाउनलोड्स अकेले भारत में हुए।

जनवरी में टिक टॉक को दुनियाभर में 10.47 करोड़ बार डाउनलोड किया गया, उसमें से 34.4% डाउनलोड्स भारत में हुए थे। उसके बाद फरवरी में 11.3 करोड़, मार्च में 11.5 करोड़, अप्रैल में 10.7 करोड़ और मई में 11.1 करोड़ बार टिक टॉक को डाउनलोड किया गया।

पांचों महीने में भारत ही पहला देश था, जहां टिक टॉक के सबसे ज्यादा डाउनलोड्स हुए थे।

लॉकडाउन में भी आरोग्य सेतु से ज्यादा टिक टॉक डाउनलोड हुआ
सेंसर टॉवर पर भारत में टिक टॉक डाउनलोड्स के 10 अप्रैल तक के आंकड़े बताते हैं कि कोरोना महामारी के बीच भारत में टिक टॉक सबसे ज्यादा डाउनलोड की जाने वाली ऐप्स थी।

इसमें 1 मार्च से लेकर 10 अप्रैल तक का डेटा मौजूद है। इसको तीन हिस्से में बांटा गया है। पहली हिस्सा 1 मार्च से 11 मार्च तक का, जब कोरोनावायरस के भारत में कुछ ही मामले थे। दूसरा हिस्सा 11 मार्च से 25 मार्च का है, जब देश में कोरोना के मामले बढ़ने लगे थे और वर्क फ्रॉम होम और सोशल डिस्टेंसिंग लागू होने लगी थी। तीसरा हिस्सा 25 मार्च से 10 अप्रैल का है, जब भारत में लॉकडाउन लग गया था।

इसमें 1 मार्च से 11 मार्च के बीच टिक टॉक को 1 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया गया। जबकि, 11 मार्च से 25 मार्च के बीच इसे 1.89 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड दिया गया। वहीं, 25 मार्च से 10 अप्रैल के बीच ये 1.40 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड हुआ

इसी बीच 2 अप्रैल को सरकार ने आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च की थी। अभी इसको साढ़े 13 करोड़ से ज्यादा लोगों ने डाउनलोड कर लिया है। लेकिन, 15 अप्रैल तक इसके 5 करोड़ डाउनलोड्स ही थे।

भारत से कितनी कमाई होती है टिक टॉक को?
टिक टॉक के लिए चीन के बाद भारत सबसे बड़ा बाजार है। भारत में इसके 20 करोड़ से ज्यादा एक्टिव यूजर्स हैं। डिजिटल इकोनॉमी वेबसाइट एन्ट्रैकर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में टिक टॉक को भारत से 23 से 25 करोड़ रुपए का रेवेन्यू मिला था।

वहीं, इस साल जुलाई-सितंबर तिमाही तक टिक टॉक ने भारत से 100 करोड़ रुपए का रेवेन्यू हासिल करने का टारगेट रखा था।

ये खबरें भी पढ़ें...

1.चीन के ऐप्स पर पाबंदी / टिक टॉक, यूसी ब्राउजर और शेयर इट समेत 59 चाइनीज ऐप्स पर बैन, सरकार ने कहा- ये देश की सुरक्षा और एकता के लिए खतरा

2.निर्भर भारत / एंटरटेनमेंट, डेटा शेयरिंग, फोटो एडिटिंग तक के लिए हम चीनी ऐप्स पर निर्भर; टिकटॉक, पबजी, यूसी ब्राउजर से लेकर जूम तक सब चाइनीज

3.ऐप से देश की सुरक्षा को खतरा / रक्षा मंत्रालय ने 2017 में डोकलाम विवाद के ठीक बाद चीन सीमा पर तैनात सैनिकों से 42 चाइनीज ऐप डिलीट करने को कहा था



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क्यों राफेल की तरह पहले मिग 21 और जगुआर भी अंबाला में ही तैनात हुए थे और इससे मुकाबले के लिए चीन के पास कोई फाइटर नहीं हैं https://ift.tt/3dOwabu

भारत को 27 जुलाई तक फ्रांस से 6 राफेल फाइटर जेट मिलने वाले हैं। इन फाइटर जेट को अम्बाला एयरबेस पर तैनात किया जाएगा। भारत राफेल बनाने वाली फ्रेंच कंपनी दसॉ एविएशन से 36 फाइटर जेट खरीदेगा। उम्मीद है कि 2022 तक ये सभीफाइटर जेट मिल जाएंगे।

एलएसी पर चीन के साथ जारी तनाव के बीच राफेल हमारे लिए बहुत जरूरी भी था। भारतीय वायुसेना ने पहले भी फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे देशों से फाइटर जेट खरीदे हैं। फ्रांस से हमने जो भी फाइटर जेट खरीदे हैं, वो सभी दसॉ एविएशन के हैं।

इसमें 1953 से 1965 के बीच 104 एमडी 450 ओरागेन (भारत में इसे हरिकेन कहते हैं) खरीदे थे। 1957 से 1973 के बीच 110 एमडी 454 मिस्टेरे-5 खरीदे थे। 1985 में मिराज 2000 खरीदे थे। मिराज का इस्तेमाल हम कारगिल की लड़ाई और बालाकोट एयरस्ट्राइक में भी कर चुके हैं।

27 जुलाई को फ्रांस से राफेल फाइटर जेट की पहले खेप आएगी। इसके तहत 6 विमान भारत पहुंचेंगे।

राफेल फाइटर जेट के आने के बाद भारत की कितनी ताकत बढ़ेगी? चीन के विमानों की तुलना में ये कितना शक्तिशाली होगा? ये सब समझने के लिए पढ़िए रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा का एक्सप्लेनर...

भारतीय पायलट राफेल भारत लेकर पहुंचेंगे
राफेल को भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट ही फ्रांस से लेकर भारत पहुंचेंगे। भारत आने से पहले पायलट फ्रांस में ही उड़ान भरकर प्रैक्टिस करेंगे। फ्रांस के बोर्डेक्स मेरिग्नेक एयरफील्ड से भारतीय पायलट 25 जुलाई को उड़ान भर सकते हैं। 6 एयरक्राफ्ट तीन-तीनविमान के ग्रुप में बंटेंगे। इन विमानों के साथ सी-70 या आईएल-76 जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी होंगे। ये एयरक्राफ्ट इंजीनियर्स, टेक्नीशियन और स्पेयर पार्ट्स को लेकर आएंगे।

इसके लिए एक बड़े विमान की जरूरत है, क्योंकि एक विशेष लोडिंग ट्रॉली के साथ एक स्पेयर इंजन भी होगा। इस समय राफेल अनआर्मर्ड होंगे, इसलिए एक्सटर्नल फ्यूल टैंक की भी जरूरत होगी। फ्रांस से भारत आने के बीच सिर्फ एक ही स्टॉप होगा। पहले तो फ्रांस की वायुसेना इसमें फ्यूल भरने की सुविधा देगी। करीब 4 घंटे तक उड़ान भरने के बाद रिफ्यूलिंग के लिए और पायलट के आराम के लिए इसको रोकना होगा। मिराज 2000 जब भारत आया था तो कई जगह रुका था, लेकिन राफेल एक स्टॉप के बाद सीधे अम्बाला एयरबेस पर उतरेगा।

तस्वीर पिछले साल की है जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह राफेल विमान लाने के लिए फ्रांस पहुंचे थे।

फ्रांस में हुई है राफेल के पायलट्स की ट्रेनिंग

राफेल उड़ाने के लिए भारतीय वायुसेना के पायलट्स की ट्रेनिंग फ्रांस के मोंट-डे-मार्सन एयरबेस पर हुई। यहीं पर मिराज 2000 की ट्रेनिंग भी हुई थी। न सिर्फ भारतीय वायुसेना के पायलट्स बल्कि इंजीनियरों और टेक्नीशियंस को भी ट्रेनिंग दी गई है। यही लोग भारत आकर दूसरे साथियों को ट्रेनिंग देंगे।
17वीं स्क्वाड्रन गोल्डन एरोज राफेल की पहली स्क्वाड्रन होगी। खास बात ये है कि पूर्व एयर चीफ बीएस धनोआ ने कारगिल युद्ध के दौरान इस स्क्वाड्रन की कमान संभाली थी। विदेशों से ट्रेनिंग लेकर आए पायलट इस स्क्वाड्रन में तैनात होंगे। एक साल बाद जब हाशमीरा में राफेल की दूसरी स्क्वाड्रन तैयार होगी, तब वहां पायलट का ग्रुप बंट जाएगा।

मिग 21 और जगुआर भी अंबाला में ही तैनात हुए थे

शुरुआत में जगुआर और मिग-21 बाइसन जैसे लड़ाकू विमानों को भी अंबालाएयरबेस पर ही तैनात किया गया था। यह एयरबेस भारत की पश्चिमी सीमा से 200 किमी दूर है और पाकिस्तान के सरगोधाएयरबेस के नजदीक भी है। यहां पर तैनाती से पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के खिलाफ तेजी से एक्शन लिया जा सकेगा। दिलचस्प बात ये भी है कि अंबालाएयरबेस चीन की सीमा से भी 200 किमी की दूरी पर है। अंबालाएयरबेस से 300 किमी दूर लेह के सामने चीन का न्गारी गर गुंसा एयरबेस है।

राफेल की तैनाती के लिए यहां पर इन्फ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया गया है। स्पेशल ब्लास्ट पेन, एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स वारफेयर सिस्टम लैब, हथियार तैयार करने वाले क्षेत्रों समेत तकनीकी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है या फिर उसे रिडेवलप किया गया है। हालांकि, इंजन के टेस्ट के लिए और सुविधाओं की जरूरत हो सकती है। बाद में इसी तरह का इन्फ्रास्ट्रक्चर हाशिमारा में भी तैयार किया जाएगा।

सबसे फुर्तिला विमान जिससे परमाणु हमला भी कर सकते हैं

राफेल डीएच (टू-सीटर) और राफेल ईएच (सिंगल सीटर), दोनों ही ट्विन इंजन, डेल्टा-विंग, सेमी स्टील्थ कैपेबिलिटीज के साथ चौथी जनरेशन का विमान है। ये न सिर्फ फुर्तीला विमान है, बल्कि इससे परमाणु हमला भी किया जा सकता है।

इस फाइटर जेट को रडार क्रॉस-सेक्शन और इन्फ्रा-रेड सिग्नेचर के साथ डिजाइन किया गया है। इसमें ग्लास कॉकपिट है। इसके साथ ही एक कम्प्यूटर सिस्टम भी है, जो पायलट को कमांड और कंट्रोल करने में मदद करता है। इसमें ताकतवर एम 88 इंजन लगा हुआ है। राफेल में एक एडवांस्ड एवियोनिक्स सूट भी है। इसमें लगा रडार, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन सिस्टम और सेल्फ प्रोटेक्शन इक्विपमेंट की लागत पूरे विमान की कुल कीमत का 30% है।

इस जेट में आरबीई 2 एए एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार लगा है, जो लो-ऑब्जर्वेशन टारगेट को पहचानने में मदद करता है। इसमें सिंथेटिक अपरचर रडार (SAR) भी है, जो आसानी से जाम नहीं हो सकता। जबकि, इसमें लगा स्पेक्ट्रा लंबी दूरी के टारगेट को भी पहचान सकता है।

तस्वीर पिछले साल अक्टूबर की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बीच में, एक तरफ भारत के सैन्य अधिकारी व दूसरी तरफ फ्रांस के।

इन सबके अलावा किसी भी खतरे की आशंका की स्थिति मेंइसमें लगा रडार वॉर्निंग रिसिवर, लेजर वॉर्निंग और मिसाइल एप्रोच वॉर्निंग अलर्ट हो जाता है और रडार को जाम करने से बचाता है। इसके अलावा राफेल का रडार सिस्टम 100 किमी के दायरे में भी टारगेट को डिटेक्ट कर लेता है।

राफेल में आधुनिक हथियार भी हैं। जैसे- इसमें 125 राउंड के साथ 30 एमएम की कैनन है। ये एक बार में साढ़े 9 हजार किलो का सामान ले जा सकता है। इसमें हवा से हवा में मारने वाली मैजिक-II, एमबीडीए मीका आईआर या ईएम और एमबीडीए मीटियर जैसी मिसाइलें हैं। ये मिसाइलें हवा में 150 किमी तक के टारगेट को मार सकती हैं।

इसमें हवा से जमीन में मारने की भी ताकत है। इसकी रेंज 560 किमी है।इस एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, माली और सीरिया में हो चुका है। इस फाइटर जेट के आने से भारत की ताकत हिंद महासागर में भी बढे़गी।

राफेल से मुकाबले के लिए चीन के पास कोई फाइटर नहीं

चीन के पास अभी चेंगड़ू जे-10 विमान है, जो इजरायल के लावी एयरक्राफ्ट का मॉडिफाइड रूप है। चीन का ये विमान अमेरिका के एफ-16 ए/बी के बराबर ही है। चीन के पास ऐसे 400 विमान हैं। इस विमान में 100 किमी तक की रेंज में मारने वाली पीएल-12 बीवीआर मिसाइलें हैं। इसके अलावा चीन के पास शेन्यांग जे-11 भी है, जो सुखोई 27 की कॉपी है। इसमें पीएल-12 मिसाइलें लगी हैं। ये भारत के पास मौजूद सुखोई 30एमकेआई की तरह है।

इसके अलावा चीन ने एक शेन्यांग जे-16 फाइटर जेट भी बनाया है, जो रूस के सुखोई 30 एमकेके का मॉडिफाइड वर्जन है। चीन के पास ऐसे 130 फाइटर जेट हैं। इस विमान में 150 किमी तक की मारक क्षमता वाली पीएल15 मिसाइल भी तैनात हो सकती हैं। चीन के पास सुखोई 30 एमकेके भी है, जो भारतीय वायुसेना के पास मौजूद सुखोई-30एमकेआई की तरह है। चीन के पास सुखोई 35 भी है, जो सुखोई 30 एमकेके की तुलना में एडवांस्ड वैरियंट है। इन सबके अलावा चीन के पास 5वीं पीढ़ी का जे-20 फाइटर जेट भी है। जो अभी ऑपरेशनल नहीं है।

पिछले साल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह नेराफेल में सवार हुए थे। उन्होंने करीब 30 मिनट तक उड़ान भरी।

जबकि, भारतीय वायुसेना के पास राफेल, सुखोई 30एमकेआई, मिराज 2000 और मिग 29 का एक शानदार कॉम्बिनेशन है। इसके अलावा जगुआर, मिग 21 बाइसन और स्वदेश एलसीए एमके1 भी है। भारत को जो राफेल मिलने वाला है, उसका मुकाबला करने के लिए चीन के पास कोई लड़ाकू विमान नहीं है।

वहीं, पाकिस्तान के पास सबसे अच्छा फाइटर जेट एफ-16 ब्लॉक 52 है, जिसकी मिसाइल की मारक क्षमता 120 किमी तक की है। कुल मिलाकर पाकिस्तान और चीन की तुलना में भारतीय वायुसेना के पास अच्छे फाइटर जेट हैं।

आधुनिक हथियारों से लैस राफेल सबसे बेहतरीन लड़ाकू विमान है, जिसमें जमीनी हमले, एंटी-शिप स्ट्राइक और परमाणु हमले करने की ताकत है। दसॉ का बनाया गया फाइटर जेट एक ओम्नीरोल विमान है। इसमें AESA रडार, आईआरएसटी, एवियोनिक्स फ्यूस्ड डेटा, स्टील्थ फीचर्स, स्पेक्ट्रा प्रोटेक्शन सूट है। सबसे खास बात ये है कि इसके दोनों तरफ हथियार रखे जा सकते हैं। हमारे पास 36 राफेल विमान होंगे। हालांकि, इतने विमान दो स्क्वाड्रन भी नहीं बनाते। भारत ने भी पहले ऐसा किया है और बाद में 36 विमान ऑर्डर किए हैं।

(एयर मार्शल अनिल चोपड़ा, रिटायर्ड फाइटर पायलट हैं, वे बतौर एयर ऑफिसर इंचार्ज पर्सनल 2012 में रिटायर हुए हैं।)



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Importance and power of rafale fighter jet with compared to china.


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कश्मीरियों की मौत पर चुप रहे, कश्मीर के बच्चों को आतंकवादी बनाया और अपने बच्चों के लिए विदेश में पढ़ाई और नौकरियां बटोरी https://ift.tt/38iBym4

तारीख थी 21 अक्टूबर 2010 और जगहदेश की राजधानी दिल्ली का एलटीजी ऑडिटोरियम। इस ऑडिटोरियम में सैयद अली शाह गिलानी वामपंथी कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन का विषय था- "आजादी-द ओनली वे'। हॉल में मंच पर अरुंधति रॉय, वरवारा राव और एसएआर गिलानी भी बैठे हुए थे और नारे गूंज रहे थे "हम क्या चाहते आजादी'। सैयद अली शाह गिलानी जम्मू-कश्मीर पर भारत के रवैये के खिलाफ थे।

सोमवार सुबह अचानक गिलानी ने अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफे की घोषणा कर दी। 47 सेकंड की एक ऑडियो क्लिप में 91 साल के गिलानी ने कहा कि उन्होंने संगठन के मौजूदा हालात को देखते हुए हुर्रियत से अलग होने का फैसला लिया है। बाद में दो पन्ने के एक लेटर में उन्होंने अपने अलगाववादी साथियों पर राजनीतिक भ्रष्टाचार और फाइनेंशियल गड़बड़ियां करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तान में हुर्रियत के अलगाववादियों पर भी मजहब को गलत तरीके से पेश करने और फैसले लेने से पहले उनसे सलाह न लेने का दोषी ठहराया।

हुर्रियत के पतन को राजनीतिक भ्रष्टाचार के परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि गिलानी इतने सालों से निर्दोष कश्मीरियों की मौत पर चुप रहे और हमेशा तहरीक (आंदोलन) पर अपने परिवार को वरीयता दी। गिलानी ने अपने बच्चों और पोतों के लिए सरकारी नौकरी सुरक्षित रखने की कोशिश की, जिसे उनके सबसे करीबी दोस्तों और साथियों ने विश्वासघात के रूप में देखा।

यह तस्वीर रमजान के इफ्तार की है। यासीन मलिक और मीरवाइज उमर फारूक के साथ गिलानी (कुर्सी पर बैठे हुए)।

90 के दशक में गिलानी ने कट्टरपंथ का रास्ता अपनाया

गिलानी तीन बार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विधायक चुनकर आए। उन्होंने भारत के संविधान की शपथ ली थी। गिलानी के कट्‌टरपंथी बनने का रास्ता 90 के दशक में तब शुरू हुआ, जब घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हो रहा था। गिलानी पहले एक शिक्षक थे, लेकिन बाद में वो जमात की तरफ खींचते चले गए। 90 के दशक की शुरुआत से, गिलानी ने ये प्रचार करना शुरू कर दिया कि इस्लाम को हिंदू भारत से बचाने के लिए कश्मीर की आजादी जरूरी थी। इससे वो पाकिस्तान के करीब आते गए और धीरे-धीरे कश्मीर में भारत के खिलाफ जिहाद करने पर उतर आए।

गिलानी ने शुरू में निजाम-ए-मुस्तफा (पैगंबर का आदेश) का विचार कश्मीर में फैलाया, लेकिन बाद में यही विचार "गिलानी वाली आजादी' के रूप में बदल गया, जिसका मतलब था हिंसक रास्तों पर चलना। बाद में ये सब हाथ से निकलकर आतंकवाद बन गया और जिहादी मानसिकता खुद गिलानी से बड़ी हो गई।

2008 से 2010 तक और आखिरकार 2016 में भी, गिलानी ने बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शनों को उकसाने और जम्मू-कश्मीर में एक सांप्रदायिक विभाजन को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आजगिलानी खुद अलग-थलग पड़ गए हैं।

हुर्रियत अलगाववाद की कमर तोड़ने के लिए भारत सरकार ने अब चुप रहने का ही रास्ता चुन लिया है। हालांकि, सूत्रों से पता चलता है कि गिलानी को पाकिस्तान का समर्थन करने की अपनी मूर्खता का एहसास हो गया है।लोकल आबादी को खत्म करने के लिए पाकिस्तान सालों से कश्मीर में हथियारों और नशीली दवाओं का इस्तेमाल कर रहा है। सूत्र कहते हैं कि अब पाकिस्तान ने गिलानी को समझा दिया है कि वो अब उनके लिए उतने उपयोगी नहीं रह गए हैं।

क्या परिवार की वजह से हुर्रियत में दरार पड़ी?
गिलानी के इस फैसले से उस जॉइंट रेसिस्टेंस लीडरशिप को भी झटका लगा है, जो उन्होंने कुछ साल पहले मीरवाइज उमर फारूक और यासीन मलिक के साथ मिलकर बनाई थी। दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैद मीरवाइज उमर फारूक और यासीन मलिक, गिलानी के फैसले पर चुप हैं और कोई भी अलगाववादी नेता इस पर कुछ भी कहने से बच रहा है।

गिलानी की ये तस्वीर अशरफ सहराई के साथ है, जिन्हें उनके बाद हुर्रियत का सबसे बड़ा नेता माना जा रहा है।

क्योंकि, गिलानी के अचानक इस्तीफे के कारणों पर बहस जारी है और अब ध्यान हुर्रियत के भीतरी नेतृत्व संकट की ओर जाता है। गिलानी की जगह कौन होगा? इस पर अभी कुछ तय नहीं है। हालांकि, सालों से पत्थरबाजी का काम कर रहे मसरत आलम को गिलानी के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन वो अभी तिहाड़ जेल में है। उसके अलावा अशरफ सहराई का नाम भी चर्चा में है।

हुर्रियत के नेता नईम खान ने गिलानी पर लगाया था आरोप

हुर्रियत में भीतरी दरार कोई नया मामला नहीं है। मई 2017 में एक पत्रकार से टेलीफोन पर बातचीत में हुर्रियत के नेता नईम खान और हिजबुलमुजाहिदीन के फाउंडर अहसान डार ने कहा था कि जब हवाला फंडिंग के मामले में एनआईए ने उनके घर पर छापा मारा था, तब गिलानी ने उनकी कोई मदद नहीं की थी। बातचीत में नईम खान ने तो ये तक कहा था कि अगर गिलानी की मौत हो जाती है, तो उनके जनाजे में उनके परिवार के अलावा और कोई भी कश्मीरी शामिल नहीं होगा।

ऑडियो क्लिप में नईम खान को ये कहते हुए भी सुना गया था कि गिलानी ने उन्हें बलि का बकरा बनाया। हालांकि, उन्होंने उसके बाद भी एनआईए पर पत्थरबाजी करना जारी रखा। नईम ने कहा था, "ये कैसी तहरीक (आंदोलन) है? उधर कश्मीर में मेजर गोगोई को भारतीय सेना सम्मानित करती है और यहां हमें डिमोरलाइज्ड किया जाता है। जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब उन्होंने (गिलानी ने) मुझे छोड़ दिया।'

नईम ने कहा था कि गिलानी का एक ही मकसद हैकि जब तक वो जिंदा हैं, तब तक वही लीडर रहेंगे और उनकी मौत के बाद उनके परिवार का कोई व्यक्ति लीडर बनना चाहिए। अल्ताफ फंटोश न सिर्फ गिलानी के दामाद हैं, बल्कि हुर्रियत की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य भी हैं।

मार्च 2013 में एक पत्रकार ने दक्षिणदिल्ली में मालवीय नगर में स्थित खिरकी एक्सटेंशन हाउस में गिलानी का इंटरव्यू लिया। ये वही जगह थी, जहां गिलानी सालों से पाकिस्तानी उच्च आयुक्त से मिलते थे और उनसे पैसा भी लेते थे। गिलानी ने उस समय भी पाकिस्तानी आतंकवादियों और निर्दोष कश्मीरियों की हत्या से जुड़े ज्यादातर सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया।

गिलानी ने हुर्रियत के बाद धड़ों को साथ लाकर अलगाववादियों का एक ज्वाइंट फोरम बनाया था।

जब गिलानी से पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद और यासीन मलिक के एक ही मंच साझा करने पर सवाल किया गया, तो उन्होंने हंसते हुए कहा, "ये मेरे लिए अप्रासंगिक सवाल है और मुझे इसका जवाब देने की जरूरत नहीं है।' इसके बाद जब गिलानी से हिजबुलमुजाहिदीन और उसके चीफ कमांडर सैयद सलाहुद्दीन के बारे में पूछा गया तो गिलानी ने कहा, "अगर कश्मीर में आतंकवाद और गन कल्चर आता है, तो इसकाजिम्मेदार भारत सरकार है।'

ईडी ने गिलानी पर 14.4 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था

6 साल बाद मार्च 2019 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने गिलानी के खिरकी एक्सटेंशन निवास को सील कर दिया, क्योंकि वो 1996-97 से 2001-02 तक का टैक्स भरने में नाकाम रहा था। इसके साथ ही गिलानी पर उसकी प्रॉपर्टी को ट्रांसफर करने से भी रोक दिया गया। इससे पहले ईडी ने गिलानी पर 2002 में अवैध तरीके से 10 लाख रुपए कमाने और 10 हजार डॉलर की हेराफेरी करने के आरोप में 14.4 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया था।

गिलानी की वजह से ही कश्मीरी युवा पत्थरबाज बनने पर मजबूर हुए

पिछले कुछ सालों में गिलानी की कई आतंकवादियों के साथ तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं। पाकिस्तान के नेताओं के साथ भी गिलानी की बातचीतकिसी से छुपी नहीं है। गिलानी की वजह से ही कश्मीरी युवा पत्थरबाज बनने या आत्मघाती हमलावर बनने पर मजबूर हुए हैं।

एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस समेत कई भारतीय एजेंसियों ने अपनी जांच में ये भी पाया है कि गिलानी और उनके अलगाववादी साथियों ने कश्मीरी युवाओं को हायर एजुकेशन के लिए पाकिस्तान का वीजा दिलाने के लिए पाकिस्तानी हाई कमिश्नर से सिफारिश की थी। ये वही युवा थे, जिन्हें हायर एजुकेशन की आड़ में पाकिस्तान की आईएसआई हथियार चलाने की ट्रेनिंग देती थी और बाद में ये युवा कश्मीर में सुरक्षाबलों के एनकाउंटर में मारे गए।

जम्मू-कश्मीर में सांप्रदायिक विभाजन को भड़काने में गिलानी ने कोई कसर नहीं छोड़ी।आजगिलानी खुद अलग-थलग पड़ गए हैं।

इतना ही नहीं, पाकिस्तान के आतंकवादियों के चंगुल से बचकर आए लोगों के माता-पिता के प्रति गिलानी ने कभी कोई सहानुभूति नहीं जताई। इसके बजाय गिलानी ने युवाओं को आतंक के आत्मघाती रास्ते पर धकेलना चुना।

जैसे-जैसे गिलानी राजनीति की गुमनामी में ढलते गए, वैसे-वैसे उनके साथी अलगाववादियों के पास सिर्फ दो ही रास्ते रह गए। पहला कि वो भी गिलानी की तरह ही पाकिस्तान की कठपुतली बनकर रह जाएं या फिर जम्मू-कश्मीर के विकास और भविष्य में यहां के युवाओं को मौका दें। गिलानी का इस्तीफा उन लोगों के लिए एक मौका है, जो कट्‌टरपंथ पर एजुकेशन को, एनकाउंटर पर सिनेमा को और गन कल्चर पर क्रिएटिव आर्ट्स को तरजीह देते हैं।

सरकार कोहुर्रियत पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए

घाटी में एक इंटरनल इकोसिस्टम बना है, जो अलगाववाद और आतंकवाद को फलने-फूलने देता है। बीमारी का इलाज करने की बजाय, उसके लक्षणों को ठीक करना चाहिए। अभी के लिए सरकार हुर्रियत को अपनी मौत मरने का विकल्प चुनने दे सकती है, लेकिन उसे इस्लामी संगठन पर प्रतिबंध लगाने से नहीं कतराना चाहिए, जिसने घाटी में सिर्फ जिहादी विचारधारा को बढ़ावा दिया।

गिलानी भले ही अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल370 हटने के बाद हुए विरोध प्रदर्शन या आंदोलन के लिए अपने अलगाववादियों की विफलता की जिम्मेदारी लेने से भाग सकते हैं, लेकिन कश्मीरियों की हत्या को आसानी से न भूल सकते हैं और न ही माफ कर सकते हैं।

कश्मीर की सड़कों पर इस्लामिक कट्‌टरपंथी के खून और पाकिस्तान के छद्म युद्ध पर चुप्पी ने कश्मीर में एक पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर दिया। हजारों मांओं ने अपने बच्चों को खो दिया है और आजादी की इस नासमझी लड़ाई में हजारों बच्चे अनाथ हो गए।



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सैयद अली शाह गिलानी शायद कश्मीर के वो शख्स हैं जो सबसे ज्यादा पुलिस हिरासत में या घर में नजरबंद रहे हैं।


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तिरुपति में हर रोज बाहर से आ रहे 12 हजार श्रद्धालु; जितने पहले दो घंटे में दर्शन करते थे, अब पूरे दिन में कर रहे हैं https://ift.tt/2NIOQir

सुबह के साढ़े पांच बजे हैं। कडप्पा से आए पीएस सुधीर अपनी पत्नी औरबेटे के साथ श्रीवारी ट्रस्ट के दानदाताओं के लिए ब्रेक (वीआईपी) दर्शन की लाइन में लगे हैं। वे पहले हर महीने दर्शन करने आते थे। लेकिन, पिछले तीन महीने से यहां नहीं आ पाए। हाल ही में उन्होंने श्रीवारी ट्रस्ट में 10 हजार रुपए से ज्यादका दान दिया था। इसलिएउन्हें बिना दिक्कत के ब्रेक दर्शन का विकल्प मिल गया।

ब्रेक दर्शन काटिकट होने की वजह से उन्हें तिरुमाला में एक रात रुकनेके लिए भी कमरा भी मिल गया। सुधीर सोमवार को मंदिर पहुंचे उन 12 हजार श्रद्धालुओं में से एक हैं, जिन्होंनेवेंकटेश बालाजी का दर्शन किया।

तिरुमाला पहाड़ी में कोरोना का एक भी मरीज नहीं

8 से 10 जून तक हर दिन 6 हजार से ज्यादा ट्रस्ट कर्मचारियों और स्थानीय लोगों के साथ किए गए दर्शन के ट्रायल के बाद 11 जून से आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन खोल दिया गया। इसके बाद हर दिन यह संख्या बढ़ती गई। जून के आखिर तक यह संख्या बढ़कर 12 हजार हो गई है। खास बात यह है कि तिरुमाला पहाड़ी, जहां वेंकटेश बालाजी का मंदिर है, वहां कोरोनाका एक भी मरीज नहीं है और वह ग्रीन जोन है।

यहां11 जून से आम श्रद्धालुओं के दर्शन लिए मंदिर खोल दिया गया है।

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट (टीटीडी) के धर्मा रेड्‌डी के मुताबिक तिरुमाला आने के लिए करीब 20 किमीपहले तिरुपति के अलीपिरी टोल गेट से आगे कोई तभी आ सकता है, जब उसके पास विशेष दर्शन, सर्वदर्शनम का ऑनलाइन बुक किया हुआ टिकट हो।

टाइम स्लॉट के आधार पर जारी हो रहे टिकट

टोल गेट पर थर्मल स्कैनिंग के दौरान यदि किसी श्रद्धालु में लक्षण पाए जाते हैं तो उन्हें वहीं रोक दिया जाता है। टीटीडी के गेस्ट हाउस में रुकने वाले श्रद्धालुओं को 24 घंटे में कमरा खाली करना होता है। यहां कमरे ऑड-ईवन के आधार पर बुक हो रहे हैं ताकि इन्हें ठीक से सैनिटाइज किया जा सके।

टिकट भी टाइम स्लॉट के आधार पर जारी किए जा रहे हैंताकि तय समय पर दर्शन करके श्रद्धालु तुरंत वापस लौट जाए। किसी को तिरुमाला में रुकने व सड़क किनारे फुटपाथ पर भी कहीं बैठने की इजाजत नहीं है। मुख्य मंदिर के अलावा परिसर के वाराही सहित अन्य मंदिर बंद हैं, पुष्करणी सरोवर में स्नान करने पर पाबंदी है।

भीड़ नहीं होने से आसानी से हो रहे दर्शन

चाय, कॉफी की इक्का-दुक्का स्टॉलों के अलावा पूरे तिरुमाला में रेस्तरां, खाने-पीने व अन्य चीजों की सभी दुकानें बंद हैं। दोपहर के समय का विशेष दर्शन करने के बाद हैदराबाद की पी विजया ने कहा कि वह पिछले 15 साल से यहां आ रही हैं। साल में एक बार जरूर यहां आती हैं। विजया ने कहा कि इस बार दर्शन करना उनके लिए बेहद आसान रहा।महज 20 मिनट में उन्होंने दर्शन कर लिया।

बालाजी का मंदिर के पास अभी कोरोनाका एक भी मरीज नहीं है। यह ग्रीन जोन है।

चित्तूर से आए अरुण अय्यर कहते हैं, वे सर्वदर्शन की टिकट लेकर करीब 12 बजे वैकुंठम कॉम्पलैक्स में दाखिल हुए थे, अभी डेढ़ बजे वह दर्शन करके बाहर भी आ चुके। अरुण कहते हैं, ऐसा लगा मानो वीआईपी दर्शन किए हों, न धक्का-मुक्की, न इंतजार, जहां पहले एक से दो सेकेंड भी दर्शन नहीं हो पाते थे, वहीं आज 10-15 सेकेंड बालाजी को निहारने का मौका मिला। उनका सुझाव है कि टीटीडी को सदा के लिए यह व्यवस्था अपनानी चाहिए।

उनके साथ आईं नीलिमा कहतीं हैं, कोरोना का डर तो है, इसीलिए यात्री मास्क भी पहने हुए हैं और दूर-दूर भी चल रहे हैं। हम भी हिम्मत करके आ गए। अब यदि कुछ हुआ भी तो मन में संतोष है कि हमने बालाजी के दर्शन कर लिया है। हम तो काफी सावधानी बरत रहे हैं बाकी बालाजी देखभाल करेंगे।

आम दिनों में मंदिर की सेवा-पूजा में कम से कम 50 अर्चक (पुजारी) मौजूद रहते हैं। लेकिन, इन दिनों केवल 15 अर्चक ही सुबह ढाई से तीन बजे के बीच सुप्रभातम से लेकर रात्रि पौने एक बजे की एकांत सेवा तक रहते हैं।

तिरुपति शहर में बढ़ रहे संक्रमण के मामले

तिरुपति शहर में अब तक 231 लोग संक्रमित मिले हैं। यहां के 50 वार्डों में से 36 में कंटेनमेंट जोन बन चुका है।

हालांकि तिरुपति शहर के हालात बिल्कुल अलग हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी कोरोनासंक्रमण बढ़ रहा है। तिरुपति के 50 में से 36 वार्डों में कंटेनमेंट जोन बन चुका है। करीब साढ़े तीन लाख की आबादी वालेइस शहर में अब तक 231 लोग संक्रमित हो चुके हैं। 8 जून को तिरुपति में मरीजों की संख्या महज 22 थी, जो 22 दिन में (30 जून) 10 गुना बढ़ गई। तिरुपति के रुइया अस्पताल की एमएस डॉ. टी भारती ने कहा कि इनमें से स्थानीय लोग तो 30 से भी कम हैं, ज्यादातरमरीज तिरुपति के बाहर के इलाकों से हैं।

90 फीसदी होटल और गेस्ट हाउस बंद

तिरुपति में 800 से ज्यादा छोटे-बड़े होटल, लॉज व गेस्ट हाउस हैं लेकिन कंटेनमेंट जोन में होने के चलते 90 फीसदी से ज्यादा बंद हैं। तिरुपति में करीब 3 हजार टैक्सियां हैं, जिनमें से ज्यादातरका धंधा ठप पड़ा है। तिरुपति के वरिष्ठ पत्रकार ए रंगराजन कहते हैं कि तिरुपति आने पर यात्री तिरुमाला के साथ-साथ वेल्लूर के स्वर्ण मंदिर व कालाहस्ती भी जाना पसंद करते थे। लेकिन, इस समय आवागमन की छूट नहीं होने से वे केवल तिरुमाला अपने वाहनों से आ रहे हैं और कहीं जाए बगैर सीधे लौट रहे हैं।

संक्रमण के डर से लोग होटल में कम पहुंच रहे हैं। जो आ रहे हैं उनके लिए जरूरी एहतियात बरते जा रहे हैं।

संक्रमण के डर से कोई होटल, लॉज में रुकना भी नहीं चाहता। लोग पैकेट बंद नमकीन, बिस्किट या फल खाकर समय गुजार लेते हैं लेकिन जो रेस्तरां खुले हैं, वहां जाने से डर रहे हैं। रंगराजन कहते हैं कि तिरुमाला का श्रीवारी मंदिर देश का एकमात्र मंदिर है जिसके प्रबंधन में तीन सीनियर आईएएस (इनमें से एक प्रमुख सचिव स्तर के) अधिकारी लगे हैं। मंदिर के पास पर्याप्त फंड भी है और कर्मचारियों की फौज भी। यहीवजह है कि यहां यात्रियों कोदर्शन करने का मौका मिल रहा है।

धर्मारेड्डी ने कहा कि कोरोना के बढ़ते संक्रमण में दर्शन खोलना बेहद जोखिम भरा है लेकिन टीटीडी ने इसे एक चुनौती की तरह लिया है। भगवान की कृपा से तिरुमाला में अभी तक सबकुछ नियंत्रण में हैं।

अभी फ्री दर्शन के लिए 3 हजार टिकट जारी किए जा रहे हैं, अगर हालात ठीक रहे तो संख्या बढ़ सकती है।

हालात ठीक रहे तो ज्यादा जारी होंगे टिकट

टीटीडी ने सोमवार को जुलाई महीने में दर्शन टिकट का कोटा जारी किया। अब प्रतिदिन विशेष दर्शन (300 रुपए) के 9000 टिकट और सर्वदर्शनम (निशुल्क दर्शन) के 3000 टिकट जारी हो रहे हैं। टीटीडी यह भी विचार कर रहा है कि यदि हालात ठीक रहे तोअगले 10 दिन में सर्वदर्शनम के लिए 4 से 5 हजार तक टिकट जारी होने लगेंगे।

पड़ोस के सभी प्रदेशों की सीमाएं सील होने के चलते तिरुपति पहुंचने वाले श्रद्धालुओं में फिलहाल 90 फीसदी सेज्यादा आंध्र प्रदेश के अलग-अलगजिलों से ही हैं। हालांकि निजी वाहनों से पड़ोसी राज्यों व दूरदराज के शहरों से उड़ान द्वारा भी श्रद्धालु तिरुपति आ रहे हैं।

तिरुपति एयरपोर्ट पर आने वाले यात्रियों का कोरोना टेस्ट जरूरी है। याताजा कोरोना-निगेटिव रिपोर्ट दिखाने पर ही उन्हें शहर में घूसनेकी इजाजत मिलती है। तिरुपति आने वाले श्रद्धालुओं में से 200 लोगों केरैंडम टेस्ट किए जा रहे हैं। हालांकि टीटीडी प्रशासन ने यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है कि इस रिपोर्ट के नतीजे क्या आ रहे हैं।



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तिरुपति बालाजी मंदिर देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शुमार हैं। कोरोना के कारण मंदिर में दर्शन पर पाबंदी लगा दी गई थी। 11 जून से दर्शन के लिए मंदिर खोल दिया गया है।


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हर दिन मरीजों को बचाने का हौंसला जुटाती हैं, लेकिन घर आकर अपनों का दर्द नहीं बांट पातीं https://ift.tt/3ijTWQr

आज भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जा रहा है। स्वतंत्रता सेनानी और बंगाल के सीएम रहे भारत रत्न डॉ. बिधानचंद्र रॉय की याद में मनाया जाने वाला यह दिन इस बार विशेष भी है। आज का दिन दिन-रात जुटे उन डॉक्टर्स को सलाम करने का है जिनके लिए कोरोनावायरस को हराना ही एकमात्र लक्ष्य है।

दुनिया के हर देश में पहुंचे कोरोना से लड़ने के लिए इन फ्रंटलाइन डॉक्टर्स की हजारों कहानियां है। त्याग, समर्पण और संघर्ष की इन कहानियों में ही जिंदगी की उम्मीदे जगमगा रही हैं क्योंकि इस 2020 के डॉक्टर्स डे पर ऐसा लगता है कि हमारा हर दिन डॉक्टर्स की मेहरबानी पर है।

आज इस दिन के मौके परफोटो में देखते हैं फिलीपींस के दो डॉक्टर की कहानी जो बताती है कि हालात कितने मुश्किल हैं और डॉक्टर कितनी हिम्मत के साथ डटे हैं। (सभी फोटो रायटर्सएजेंसी के सौजन्य से)

सबसे पहले फिलीपींस के मनीला में काम कर रही डॉ जेन क्लेरी डोराडो की कहानी। यहां की राजधानी मनीला के ईस्ट एवेन्यू मेडिकल सेंटर हॉस्पिटल में कोविड-19 के इमरजेंसी रूम में काम की जिम्मेदारी लेने वाली इस डॉक्टर की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। जब उन्होंने काम शुरू किया तो सबसे पहले मन में आया कि अब घर नहीं जाना है ताकि परिवारजनों को इंफेक्शन से बचा सकूं, लेकिन वह ऐसा कर नहीं पाईं।

बीते दो महीने से डॉ. जेन हर रोज बड़े हौसले के साथ कोविड-19 इमरजेंसी रूम में अपनी सेवाएं दे रही हैं। हर रोज वे करीब 12 घंटे की शिफ्ट करने के बाद घर लौटती हैं तो उनके मन में हमेशा यही डर होता है कि मैं कहीं इंफेक्शन का कारण न बन जाऊं।
30 साल की डॉ. जेन के पैरेंट्स ने अपनी डॉक्टर बेटी पर बहुत दबाव बनाया कि वह उनके साथ घर में रहें, लेकिन बेटी उनसे दूर रहना चाहती थी। ऐसे में उनके पिता ने अपने स्टोरेज रूम में ही एक प्लास्टिक शीट और फॉइल लगाकर आइसोलेशन एरिया बना दिया। अब हर रोज डॉ. जेन हॉस्पिटल से घर पहुंचकर बाहर शूज उतारती हैं और उसी आइसोलेशन एरिया में रात बिताती हैं।
उनके पैंरेट्स की चिंता है कि वे बेटी के लिए कुछ कर सकें। इसीलिए वे उसके लिए खाना पहले ही एक स्टूल पर रख देते हैं और खुद प्लास्टिक शीट में बनी खिड़की से उसे देखते रहते हैं। डॉ. जेन भी उनका वहीं से हालचाल पूछती हैं। वे अपनी प्यारी बिल्ली को दुलार भी उसी खिड़की से कर लेती हैं।
डॉ. जेन डोराडो कहती हैं कि, ये सबसे मुश्किल घड़ी होती है क्योंकि मैं अपनों के पास होकर भी उनसे दूर हूं। लेकिन, ये करना ही पड़ेगा क्योंकि और कोई विकल्प भी नहीं है। मेरी मां की इच्छा मुझे को गले लगाने की होती है, लेकिन मैं उन्हें ऐसा न करने देने के लिए मजबूर हैं।
हॉस्पिटल में डॉ. जेन और उनके साथियों का अधिकतर समय आईसीयू में भर्ती गंभीर मरीजों की देखभाल में बीतता है। उनके देश में कोरोना के कारण सैकड़ों मेडिकल वर्कर्स संक्रमित हुए हैं और 30 से ज्यादा डॉक्टरों की भी मौत हो चुकी है। बावजूद इसके वे पूरे हौसले से जुटी हुई हैं।
यह दूसरी कहानी मनीला की ही एक अन्य डॉक्टर की है जो बच्चों को बचाने में जुटी हैं। 38 साल की पेडियाट्रिशियन डॉ. मीका बास्टिलो मनीला के एक दूसरे हिस्से में बच्चों के हॉस्पिटल में काम करती है जो कि अब एक कोविड रेफरल फेसिलिटी बना दिया गया है। डॉ. मीका कहती हैं कि, मेरी फैमिली चाहती हैं कि मैं अपना काम छोड़ दूं, लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा करना सही नहीं, क्योंकि मैं जहां जाऊंगा कोरोना को तो फेस करना ही पड़ेगा।
डॉ. मीका के पिता और उनकी बहन भी काफी बीमार हैं और उन्हें भी मेडिकल सपोर्ट पर रखा गया है, बावजूद इसके उनके परिवार ने अपने घर के बाहर अस्थायी जगह बना दी है जिसमें जरूरत भर का सामान है। डॉ. मीका रोज यहीं रहती है और इसे अपना "क्वारैंटाइन होम" कहती हैं।बारिश से बचने के लिए इस तंबू नुमा जगह को प्लास्टिक शीट से ढंक दिया गया है और इसी के जरिये उनका परिवार आपस में सुरक्षित सोशल डिस्टेंसिंग रखता है।
डॉ. मीका कहती हैं, "मेरी मां ने इसमें परदे और टेबल क्लॉथ लगा दिए हैं जिससे कि ये घर जैसा नजर आए.... और मेरे भाई ने प्लास्टिक शीट से सेपरेशन बना दिया है।कोरोना के कारण बिगड़ते हालात के बीच डॉ. मीका हर रात N95 लगाकर परिवार के साथ प्रार्थना करती है कि ईश्वर हमें इस विपदा से उबार ले और इसी के साथ अगले दिन की तैयारियों में जुट जाती है क्योंकि उन्हें हॉस्पिटल में अपना कर्त्तव्य निभाना होता है।

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National Doctors Day 2020; How doctors shield families from COVID-19 with 'quarantent', safe spaces


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